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वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी की महत्ता व संभावना

सारांश

भाषा भावाभिव्यक्ति तथा सम्प्रेषण का एक सशक्त तथा महत्वपूर्ण माध्यम है। भाषा के अभाव में भाव उसी प्रकार लगते है जैसे आत्मा के बिना शरीर।  विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो कभी धीमी गति से तो कभी तीव्र गति से सामने आती है। जिस प्रकार मनुष्य की विकासावस्था विविध उतार-चढ़ावों का परिणाम है उसी प्रकार भाषा भी विभिन्न रूपों में प्रवाहित होती रही है। आरम्भ में जहाँ वह संकेतों के द्वारा अभिव्यक्ति का माध्यम बनी वहीँ आगे चलकर मौखिक और फिर लिखित शब्दों के रूप में सामने आयी। उसी प्रकार अपने साथ घटित किसी घटना को बताने के लिए उसने जिस माध्यम का सहारा लिया होगा वह कहानी के रूप में सामने आया होगा। अभिप्राय यह है कि आरम्भ में विभिन्न स्थितियों के गीत, कहानी, नीति-वाक्य, पहेलियाँ, भजन, स्वांग तथा नाटक आदि मौखिक साहित्य के रूप में सामने आया, तदुपरांत विभिन्न विकसावस्थाओं को पार करते हुए वह लिखित साहित्य के रूप में आया। 






 

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